भारत-EU के बीच रिसर्च सहयोग को लेकर बड़ी पहल, भारतीय वैज्ञानिकों के लिए खुलेंगे यूरोप के रास्ते
नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को नई दिशा मिलने जा रही है। दोनों पक्षों के बीच यूरोप के प्रमुख रिसर्च कार्यक्रम ‘होराइजन यूरोप’ (Horizon Europe) में भारत की भागीदारी को लेकर सहमति बनी है। इस पहल से भारतीय वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के नए अवसर मिल सकते हैं।
होराइजन यूरोप यूरोपीय संघ का प्रमुख अनुसंधान एवं नवाचार कार्यक्रम है। इसका कुल बजट 93.5 अरब यूरो है। इस कार्यक्रम के तहत दुनिया के विभिन्न देशों के वैज्ञानिक और शोध संस्थान मिलकर नई तकनीकों और वैज्ञानिक चुनौतियों पर काम करते हैं।
भारतीय शोधकर्ताओं को क्या मिलेगा फायदा?
इस सहयोग का सबसे बड़ा फायदा भारतीय रिसर्च संस्थानों और वैज्ञानिकों को मिल सकता है। उन्हें यूरोपीय संस्थानों के साथ संयुक्त शोध परियोजनाओं में भाग लेने का अवसर मिलेगा। इसके अलावा अत्याधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ काम करने का रास्ता भी खुल सकता है।
विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), स्वास्थ्य, अंतरिक्ष विज्ञान, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं बढ़ेंगी।
किन क्षेत्रों में बढ़ेगा सहयोग?
भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित वैज्ञानिक सहयोग का दायरा काफी व्यापक है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, मेडिकल साइंस, अंतरिक्ष अनुसंधान, स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक नवाचार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हो सकते हैं।
इन क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं से भारत के शोधकर्ताओं को वैश्विक स्तर पर अपनी विशेषज्ञता दिखाने का मौका मिल सकता है।
क्या भारतीय छात्रों को भी मिलेगा लाभ?
इस पहल से विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से जुड़े छात्रों तथा युवा वैज्ञानिकों के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं। हालांकि, कार्यक्रम में भागीदारी के लिए पात्रता, आवेदन प्रक्रिया और फंडिंग की शर्तें संबंधित परियोजनाओं के नियमों के अनुसार तय होंगी।
कब से शुरू हो सकता है सहयोग?
इस व्यवस्था को जनवरी 2027 से लागू किए जाने की उम्मीद जताई गई है। हालांकि, इसके अंतिम क्रियान्वयन, पात्रता और आवेदन से जुड़ी विस्तृत जानकारी के लिए आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच यह पहल केवल वैज्ञानिक सहयोग तक सीमित नहीं है। इससे दोनों पक्षों के बीच तकनीकी साझेदारी मजबूत होने और भविष्य की चुनौतियों के लिए नए समाधान विकसित करने में मदद मिल सकती है।
