RBI रुपये को संभालने के लिए फॉरेक्स रिजर्व का उपयोग कर सकता है: SBI रिपोर्ट
नई दिल्ली: Reserve Bank of India (RBI) वैश्विक अस्थिरता और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच रुपये को स्थिर रखने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर सकता है। यह बात State Bank of India (SBI) की एक हालिया रिपोर्ट में कही गई है।
सोमवार को कारोबार के दौरान रुपया एक समय डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर को पार कर गया था, हालांकि बाद में इसमें सुधार हुआ और यह 7 पैसे की मजबूती के साथ 94.78 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के चलते बाजार की धारणा कमजोर बनी हुई है, जिसका असर रुपये पर भी देखने को मिला।
SBI की आर्थिक शोध टीम के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर से अधिक है और यह 10 महीनों से ज्यादा के आयात को कवर करता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह भंडार पर्याप्त मजबूत है और जरूरत पड़ने पर सट्टेबाजी के दबाव को कम करने में मदद कर सकता है। साथ ही, RBI का हस्तक्षेप केवल गंभीर परिस्थितियों तक सीमित नहीं होना चाहिए।
रिपोर्ट में तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के लिए एक अलग विदेशी मुद्रा विंडो बनाने का सुझाव भी दिया गया है। इन कंपनियों की रोजाना लगभग 250–300 मिलियन डॉलर की मांग रहती है। इस मांग को मुख्य बाजार गतिविधियों से अलग रखने से मांग और आपूर्ति की स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
इसके अलावा, रिपोर्ट में RBI के उस फैसले पर चिंता जताई गई है, जिसमें बैंकों की नेट ओपन पोजिशन (NOP-INR) को 10 अप्रैल से 100 मिलियन डॉलर तक सीमित करने की बात कही गई है। SBI के अनुसार, इससे घरेलू और विदेशी मुद्रा बाजारों के बीच अंतर बढ़ सकता है। आमतौर पर भारतीय बैंक घरेलू बाजार में लंबी पोजिशन रखते हैं, जबकि विदेशी बाजार में उनकी स्थिति इसके विपरीत होती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, नए नियमों के चलते बैंकों को अपनी पोजिशन समायोजित करनी पड़ेगी, जिससे तरलता पर दबाव बढ़ सकता है और ऑफशोर प्रीमियम में इजाफा हो सकता है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, एक साल का नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (NDF) प्रीमियम 3.43% से बढ़कर 4.19% हो गया है, जबकि एक महीने का प्रीमियम 0.67% तक पहुंच गया।
स्थिति को संतुलित रखने के लिए SBI ने सुझाव दिया है कि 100 मिलियन डॉलर की सीमा को पूरे बैंकिंग बुक की बजाय केवल ट्रेडिंग बुक तक सीमित रखा जाए। इससे संचालन संबंधी दिक्कतें कम होंगी, खासकर उस स्थिति में जब विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकालते हैं और डॉलर की मांग बढ़ जाती है।
