कैसे बदल रही है तकनीक आदिवासी भारत की तस्वीर

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देश के बड़े शहरों और औद्योगिक इलाकों से दूर, जंगलों, पहाड़ों और दूरदराज़ के आदिवासी क्षेत्रों में एक बड़ा बदलाव धीरे-धीरे आकार ले रहा है। जिन समुदायों को दशकों तक मुख्यधारा के विकास से दूर माना जाता था, वे अब भारत की विकास यात्रा में सक्रिय भागीदारी निभाने लगे हैं। डिजिटल तकनीक, स्वास्थ्य सेवाओं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने वाली नई पहलें आदिवासी समाज के जीवन में बदलाव ला रही हैं।

इसी सोच के साथ ‘जनजातीय गौरव उत्सव’ जैसे कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिनका उद्देश्य विकास को केवल शहरों तक सीमित न रखकर देश के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। सरकार की कई योजनाएं अब सीधे उन इलाकों पर केंद्रित हैं जहां आज भी बुनियादी सुविधाओं की कमी महसूस की जाती है।

पीएम-जनमन, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान और राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन जैसी योजनाएं देश के हजारों गांवों तक पहुंच बना रही हैं। इन योजनाओं का विशेष फोकस विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) पर है, जो अब भी दुर्गम क्षेत्रों में रहते हैं। इतने बड़े स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पानी और रोजगार जैसी सुविधाएं पहुंचाना पारंपरिक व्यवस्था से आसान नहीं था। ऐसे में तकनीक सरकार और प्रशासन के लिए एक मजबूत साधन बनकर उभरी है।

अब कई क्षेत्रों में रियल टाइम मॉनिटरिंग, जियो-टैग्ड सर्वे, डिजिटल डेटा और AI आधारित प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंच सके। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है बल्कि दूरस्थ इलाकों में सरकारी सेवाओं की पहुंच भी आसान हुई है।

हाल के समय में ‘BIRSA 101’ काफी चर्चा में रहा है। इसे भारत की पहली स्वदेशी CRISPR आधारित जीन थेरेपी माना जा रहा है, जिसे सिकल सेल बीमारी के इलाज के लिए विकसित किया जा रहा है। यह बीमारी लंबे समय से मध्य और पूर्वी भारत के आदिवासी समुदायों को प्रभावित करती रही है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में यह तकनीक कम खर्च में स्थायी इलाज का रास्ता खोल सकती है।

इस परियोजना में CSIR, IGIB और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएं मिलकर काम कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल मेडिकल रिसर्च नहीं बल्कि इस बात का संकेत है कि देश की आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति अब गांवों और आदिवासी समाज तक भी पहुंच रही है।

तकनीक का इस्तेमाल केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। आदिवासी परंपराओं, भाषाओं और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म अहम भूमिका निभा रहे हैं। ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी और आयुर्जेनोमिक्स जैसी पहलें उन पारंपरिक औषधीय ज्ञान और प्रकृति आधारित जीवनशैली को दस्तावेज़ के रूप में सुरक्षित कर रही हैं, जिन्हें आदिवासी समुदाय सदियों से संभालते आए हैं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI भी अब इस बदलाव का हिस्सा बन चुकी है। इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 में कई ऐसे प्लेटफॉर्म पेश किए गए जो आदिवासी भाषाओं में काम करने के लिए तैयार किए गए हैं। इनमें ‘आदि वाणी’ नामक प्लेटफॉर्म खास चर्चा में रहा, जो आदिवासी भाषाओं का अनुवाद, टेक्स्ट-टू-स्पीच और सरकारी योजनाओं की जानकारी स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराने में सक्षम है।

इसके अलावा ‘TriBoT’ नाम का एक मल्टी-लैंग्वेज AI असिस्टेंट भी विकसित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य दूरदराज़ इलाकों में लोगों को सरकारी जानकारी और शिकायत समाधान से जोड़ना है। इन पहलों का मकसद केवल तकनीक पहुंचाना नहीं बल्कि डिजिटल इंडिया को भाषाई और सामाजिक रूप से अधिक समावेशी बनाना है।

सरकार अब आदिवासी कला, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल माध्यम से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में भी काम कर रही है। प्रस्तावित ‘TribeX’ प्लेटफॉर्म के जरिए आदिवासी संगीत, हस्तशिल्प, लोककथाओं और पारंपरिक उत्पादों को ऑनलाइन मंच देने की योजना है। साथ ही GI टैग की संभावनाओं वाले पारंपरिक उत्पादों का डिजिटल एटलस तैयार करने पर भी काम चल रहा है, जिससे स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को बाजार तक बेहतर पहुंच मिल सके।

इसके अलावा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट्स से जुड़े इनोवेशन हब युवाओं को स्टार्टअप, डिजाइन और उत्पाद विकास के क्षेत्र में नए अवसर देने की तैयारी कर रहे हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

इधर प्रशासनिक व्यवस्था भी अब तेजी से डेटा आधारित होती जा रही है। पीएम-जनमन के तहत ‘सर्वे सेतु’ प्लेटफॉर्म के जरिए लाखों परिवारों का जियो-टैग्ड सर्वे किया जा चुका है। इससे सरकार को यह समझने में मदद मिल रही है कि किन परिवारों तक योजनाओं का लाभ अभी नहीं पहुंच पाया है।

वन अधिकार अधिनियम से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए भी AI आधारित प्लेटफॉर्म पर काम किया जा रहा है, जिससे दावों की प्रक्रिया, मैपिंग और शिकायत निवारण को अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।

हालांकि इस पूरे बदलाव का असली असर आंकड़ों से ज्यादा उन छोटे-छोटे बदलावों में दिखाई देता है, जब किसी दूरस्थ गांव में रहने वाला आदिवासी परिवार अपनी भाषा में स्वास्थ्य जानकारी प्राप्त करता है, बिना बिचौलियों के सरकारी योजनाओं का लाभ ले पाता है या अपनी कला और संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान मिलते देखता है।

लंबे समय तक आदिवासी समाज को केवल पिछड़ेपन और सरकारी सहायता के नजरिए से देखा गया। लेकिन अब यह सोच बदल रही है। आज आदिवासी समुदायों की पर्यावरणीय समझ, सांस्कृतिक विरासत और संघर्षशीलता को भारत की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

तकनीक और कनेक्टिविटी जैसे-जैसे दूरदराज़ इलाकों तक पहुंच रही है, सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि विकास स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों का सम्मान करते हुए आगे बढ़े। अगर यह संतुलन बना रहा, तो आदिवासी भारत केवल विकसित भारत का हिस्सा नहीं बनेगा, बल्कि उसकी दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभाएगा।